चरण 13 / 15
अध्याय 5: न्यूरल नेटवर्क और डीप लर्निंग (भाग 2)
इमेजों को समझने के लिए कन्वोल्यूशनल न्यूरल नेटवर्क · ट्रांसफॉर्मर्स और जेनरेटिव एआई।
इमेजों को समझने के लिए कन्वोल्यूशनल न्यूरल नेटवर्क
कंप्यूटर को इंसान की तरह देखने और इमेजों को समझने की शक्ति देने के लिए कंप्यूटर साइंस ने कन्वोल्यूशनल न्यूरल नेटवर्क (CNNs - इमेजों और दृश्यों को पहचानने के लिए खास तरह के लेयर्स वाला नेटवर्क) का विकास किया। पुराने न्यूरल नेटवर्क इमेजों को समझने में इसलिए फेल हो जाते थे क्योंकि अगर तस्वीर में कोई चीज बस कुछ पिक्सेल (Pixels) भी खिसक जाए, तो सारे इनपुट नंबर बदल जाते हैं। CNNs इस समस्या को सुलझाने के लिए खास कन्वोल्यूशनल लेयर्स (Convolutional Layers) का उपयोग करते हैं। ये लेयर्स तस्वीर पर गणितीय फिल्टर (Mathematical Filters) घुमाते हैं और ऐसे लक्षण (Features) खोजते हैं जो चीज के खिसकने या छोटा-बड़ा होने (Shift and Scale Invariance) पर भी नहीं बदलते।
हम देखते हैं कि कैसे CNNs इमेजों को समझने के लिए एक के ऊपर एक सीढ़ियाँ (Hierarchy) बनाते हैं: सबसे निचली परतें केवल सीधी रेखाओं, किनारों (Edges) और बनावट (Textures) को पहचानती हैं; बीच की परतें इन रेखाओं को जोड़कर आकृतियाँ (Shapes) बनाती हैं; और सबसे ऊपर की परतें पूरी चीज, जैसे चेहरा या कोई जानवर, को पहचान लेती हैं। लक्षणों को इस तरह परतों में जोड़कर समझने का तरीका हमारे बिश्नोई बुजुर्गों या रायका चरवाहों के उस हुनर से बिल्कुल मिलता है जिससे वे दूर से ही रेगिस्तानी वनस्पतियों को पहचान लेते हैं। वे बुनियादी छाल की बनावट, काँटों की सजावट और पत्तियों के रंग जैसे शुरुआती लक्षणों को दिमाग में जोड़कर, बदलती रोशनी और दूरियों के बीच भी तुरंत पहचान लेते हैं कि सामने खड़ा पेड़ खेजड़ी है, रोहिड़ो है या खैर है।
ट्रांसफॉर्मर्स और जेनरेटिव एआई
हम अपनी तकनीकी यात्रा के इस हिस्से को उन आधुनिक आविष्कारों के साथ पूरा करते हैं जिन्होंने आज के बड़े भाषा मॉडलों (LLMs) और नई कला बनाने वाले जेनरेटिव एआई (Generative AI) को जन्म दिया है। हम क्रांतिकारी ट्रांसफॉर्मर (Transformer - पूरे वाक्य या दस्तावेज को एक साथ देखकर शब्दों के बीच के संदर्भ और ध्यान को समझने वाला आधुनिक नेटवर्क) ढांचे को समझते हैं, जिसे 2017 के मशहूर शोध पत्र "अटेंशन इज ऑल यू नीड" (Attention is All You Need) में पेश किया गया था। पुराने नेटवर्कों के विपरीत, जो किसी वाक्य को एक-एक शब्द करके क्रम से पढ़ते थे, ट्रांसफॉर्मर्स सेल्फ-अटेंशन मैकेनिज्म (Self-Attention Mechanism - वाक्य के दूर-दूर वाले शब्दों के बीच के आपसी संबंध और महत्व पर ध्यान देने की क्षमता) का उपयोग करते हैं। इससे वे पूरे दस्तावेज के सभी शब्दों को एक साथ देखते हैं और दूर लिखे शब्दों के बीच के गहरे संबंध और संदर्भ को समझ लेते हैं।
यही गहरी संदर्भीय समझ (Contextual Attention) आज के लार्ज लैंग्वेज मॉडल्स (LLMs - विशाल डेटा पर ट्रेंड भाषा मॉडल जो आगे के शब्दों की सटीक भविष्यवाणी करते हैं), जैसे ChatGPT, को इस काबिल बनाती है कि वे लंबे-लंबे दस्तावेजों में बिल्कुल सही और समझदारी भरे आगे के वाक्य लिख सकते हैं। किसी भी लंबे दस्तावेज में हर शब्द का बाकी सभी शब्दों के साथ एक साथ संबंध और महत्व समझने की इस कार्यप्रणाली (Self-Attention Mechanism) को हमारे देश की संसद के दोनों सदनों, लोक सभा और राज्य सभा, की कानून बनाने की प्रक्रिया से समझा जा सकता है। जब कोई बड़ा और महत्वपूर्ण बिल (Bill) कानून बनने के लिए आता है, तो उसे किसी एक कमरे में अकेले नहीं परखा जाता; बल्कि उसे दोनों सदनों के सामने रखा जाता है, जहाँ अलग-अलग क्षेत्रों और समितियों से आने वाले सांसद (MPs) एक साथ उस बिल की हर एक धारा (Clause) पर बहस करते हैं, एक धारा का दूसरी धारा से संबंध जोड़ते हैं, और उसके हर पहलू को आपस में तौलते हैं। जब पूरे सदन में सभी सदस्यों के गुणात्मक सुझावों (Qualitative Inputs) और आपसी संदर्भों को गहराई से तौल लिया जाता है, तभी एक सही और पूर्ण कानून बनता है। इसके साथ ही हम जेनरेटिव एडवर्सरियल नेटवर्क्स (GANs - दो नेटवर्कों के बीच मुकाबले के जरिए असली जैसी नई तस्वीरें या सामग्री बनाने की तकनीक) को भी समझते हैं, जहाँ एक बनाने वाला नेटवर्क (Generator) और एक पहचानने वाला नेटवर्क (Discriminator) आपस में मुकाबला करते हैं। यह मुकाबला हमें दिखाता है कि कैसे आपसी विरोध और चुनौती से तकनीक में गजब का निखार और पूर्णता आती है।